[ये श्री अनिल एकलव्य जी के एक विद्वतापूर्ण शोधपरक लेख का खड़ी बोली कविता में अनुवाद है। मूल लेख बिजली के खेल में हुए हार्ड डिस्क क्रैश के कारण खो गया है। उसे रिकवर करने की कोशिश चल रही है। तब तक यही सही।]
जंगल-जंगल पता चला है
धोती पहन के मोगैंबो खिला है
पगड़ी पहन के गब्बर सिंह सजा है
…
पिछली बार जो लठैतों-डकैतों ने
तोड़ा-फोड़ी और पिटाई की वो याद ही है तुम्हें
तो ये मसला अब बहुत लंबा खिंच गया है
जज साहिबान, अब इसे लॉक किया जाए
